Book Details
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Title |
Cirupancamulam -Hindi Translation |
Translator |
Dr. P. K. Balasubrahmanyan |
Publisher |
Chennai: Central Institute of Classical Tamil |
Publish Year |
2024 |
Language |
Hindi |
Book ISBN |
978-81-975737-8-1 |
Number of Pages |
92 |
Book Price |
Rs.200.00 |
About the Book:- |
सिरुपञ्चमूलम् (लघुपंचमूल ) सिरुपञ्चमूलम् अमूलम् के नाम से पता चलता है कि पाँच जड़ों का उल्लेख यहाँ किया गया है। ये पाँच जड़ी-बूटियों को सूचित करते हैं। उनको मिलाकर जो दवा बनायी जाती है, उसका सेवन कोई करें उसका शारीरिक स्वास्थ्य बडिया रहेगा। उसी प्रकार प्रस्तुत ग्रंथ में पाँच धर्मतत्व कहे गये हैं। अगर कोई उनका अमल जीवन में करे तो उसका मानसिक रोग दूर होगा। फलतः वह स्वस्थ मन का मानव बनेगा। इस ग्रंथ के रचयिता कारियासान् हैं। रचना से पता चलता है कि वे श्रमण या जैन साधु हैं। प्रस्तुत ग्रंथ के 104 पद्य हैं। इसके प्रत्येक पद्य के चार-चार चरण होते हैं। पर प्रत्येक पद्य में पाँच-पाँच सार्वक बातें या तत्व कहे गये हैं। वे सब धर्ममूलक हैं। उनका आचरण जो करेगा, वह सफल व स्वस्थ जीवन बिता पाएगा। मल्ड्रवर्तोळ् माक्कायत् माणाक्कत् मानिलत्तुप् पल्लवर् नोय्नीक्कुम् पाङ्किताल् कल्ला मनुपञ्चम् तीर्मक्कै माक्कारि याचात् चिरुपञ्च मूलम्चेय् तात्। मल्ल युद्ध प्रेमी प्रबल स्कंधी है माङ्कायन शिष्य उसके कारियासान ने रचा है सिरुपंचमूल ज्यों वर्षा होती है निष्काम्य त्यों है यह ग्रंथ अज्ञान नाशक। चंगा करता है सिरुपंचमूल औषध दैहिक रोग स्वस्थ करेगा लघुपंचमूल ग्रंथ मानसिक रोग। (विशेष पायिरम) |