Book Details
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Title |
Naladiyar -Hindi Translation |
Translator |
Dr. P. K. Balasubrahmanyan |
Publisher |
Chennai: Central Institute of Classical Tamil |
Publish Year |
2024 |
Language |
Hindi |
Book ISBN |
978-81-975737-1-2 |
Number of Pages |
268 |
Book Price |
Rs.500.00 |
About the Book:- |
नालडियार् - चार चरण पद्य तिरुक्कुरण के बाद उसी के समकक्ष सम्मान प्राप्त नैतिक ग्रंथ है नालडियार्। तमिल में प्रचलित मुहावरे इसकी विशेषता को प्रकट करते हैं। 'आलुम् बेलुम् पल्लुक्कुरिदी, नालुम् इरण्डम् सोल्लुक्कुरिदी' याने, बरगद और बबूल से मंजन करने पर दाँत मजबूत बनते हैं वैसे ही नालडियार् तथा तिरुक्कुरळ् के ज्ञान से हमारे शब्दों के प्रयोग में बल मिलता है। ऐसा कह सकते हैं कि तमिळु शब्दों की श्रेष्ठता नालडिया और तिरुक्कुरळ् में निहित हैं। इस ग्रंथ की रचना चार चरण वाले पचों से याने चौपाई से रचित है। चार चरण की तमिल में नालहि कहते हैं। इसी पर इस ग्रंथ का नाम भी ऐसा बना है। चार चरण के पयों से रचित अनेक ग्रंथ तमि में उपलब्ध होने पर भी अपनी अनोखी विशेषता के कारण जन मानस में नालडियार् का अपना अलग महत्व है। नालडियार् के कुछ पद्मों में तिरुक्कुर के विचार का उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ में जैन धर्म के विचार प्रचुर मात्रा में होने के कारण विद्वानों का विचार है कि इस ग्रंथ की रचना जैन धर्म के अनेक साधुओं ने की है। यह नैतिक ग्रंथ धन की अस्थिरता के बारे में बताते समय उल्लेख करता है कि धन गाड़ी के पहिये के बराबर एक स्थान पर स्थिर न रहकर घूमता रहेगा। नालडियार् स्पष्ट प्रकट करता है कि मानव के जीवन में धन, युवापन, तन आदि अस्थिर हैं। इस ग्रंथ के रचनाकार जैन धर्माचार्य होने के कारण जीवन की अस्थिरता स्पष्ट प्रकट की गयी है। |