Book Details
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Title |
Kar Narpatu -Hindi Translation |
Translator |
Dr. P. K. Balasubrahmanyan |
Publisher |
Chennai: Central Institute of Classical Tamil |
Publish Year |
2024 |
Language |
Hindi |
Book ISBN |
978-81-975952-8-8 |
Number of Pages |
64 |
Book Price |
Rs.150.00 |
About the Book:- |
कार् नाट्टु (वर्षाऋतु चालीसा) 'कार्' तमिळ में वर्षा ऋतु को सूचित करता है। तत्संबंधी चालीस पद्म प्रस्तुत रचना में पाए जाते हैं। इसे तमिल में कार् नादु कहा गया है। उसे हिन्दी में वर्षा चालीस' कहना समीचीन होगा। तमिळ साहित्य में, मानव जीवन का विभाजन दो भागों में, 'अगम्' व 'पुरम्' के नाम से किया गया है। पहला, निजी जीवन से, मुख्यतः घर-गृहस्थी से संबंधित है। उसका वर्ण्य विषय साधारणतः नायक व नायिका या प्रेमी व प्रेमिका के निजी जीवन से संबंधित है। नायक गृहस्थी चलाने के लिए, आवश्यक धनार्जन करने के लिए निकलेगा और बिदाई के समय यह बादा करेगा कि मैं वर्षाऋतु के आरंभ होने के पहले ही लौदूँगा। पर नहीं लौट पाएगा। नायिका या प्रेमिका को बिबिध रूप से, सखी समझाएगी कि नायक, मेघगर्जन, मूसलाधार वर्षा, नये-नये पुष्पों व वनस्पतियों का मोहक रूप देखकर चेतेगा और वादे का स्मरण करके लौटेगा। नायक भी नायिका से मिलने के लिए तड़प उठेगा और सारथी को, रथ तेज़ हाँक्कर चलने की ताकीद देगा। वह भी नायिका के शरीर पर छाये पीलापन व प्रवास जनित वेदना की याद कर दुखी होगा। नायिका की विरहजनित वेदना देखकर सखी उसे यह कहकर शांत करेगी कि हमारे यहाँ जो प्राकृतिक परिवर्तन हुए, वे नायक के यहाँ भी होंगे। उससे नायक चेतेगा और घर शीघ्र लोटेगा। कुछ पद्यों में नायिका भी अपनी बिरह बेदना चित्रित करेगी और उसका पूरा विवरण सखी को देगी। प्रस्तुत रचना के कवि हैं। हैं मदुरै कण्ण कुत्ततार्। वे मदुरै के निवासी थे और उनके पिता का नाम है कण्णत्। उनका प्रकृत नाम कूत्तत्तार् है, जो 'नटराज' का तमिळ पर्यायवाची है। |