Book Details
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Title |
Kainnilai -Hindi Translation |
Translator |
Dr. P. K. Balasubrahmanyan |
Publisher |
Chennai: Central Institute of Classical Tamil |
Publish Year |
2024 |
Language |
Hindi |
Book ISBN |
9978-81-975952-6-4 |
Number of Pages |
76 |
Book Price |
Rs.150.00 |
About the Book:- |
कैन्निलै (आचरण निर्वाह) तमिळू भाषा में "कै" के कई पर्यायवाची शब्द हैं। पर प्रस्तुत ग्रंथ के सिलसिले में वह "आचरण" का पर्यायवाची माना गया है। "निलै" का माने अमल करना है। इसलिए प्रस्तुत ग्रंथ को आचरण-निर्वाह मान सकते हैं। प्रस्तुत ग्रंथ को ऐन्दिणै साठ माना जाता है। क्योंकि इस ग्रंथ के 60 पद्म हैं। प्रत्येक क्षेत्र के बारह पचों की रीति से पाँचों क्षेत्रों के याने क्रम से कुरिंजि (पर्वत व पर्वतोंचल), पालै (मरुभूमि), मुल्लै (वन-वनांतर), मरुदम् (समतल व कृषि क्षेत्र) और नेय्द्रल् (समुद्र व समुद्रतट वीं) प्रदेशों के पद्म पाए जाते हैं। इनमें 18 पद्म नष्ट-भ्रष्ट रूप में मिलते हैं। वे हैं- 1, 8, 14-17, 20, 26-35 व 38 संख्याओं के हैं। इनमें तीन पचों के एक-एक शब्द नहीं मिलते। असल में अंतिम प्रदेन नेय्दल् के बारह पद्म पूर्ण रूप में मिलते हैं। प्रस्तुत ग्रंथ के रचयिता हैं पुल्लङ्गाडतार् हैं। ये पांड्य देश के निवासी थे। अन्य तिर्ण ग्रंथों के समान प्रस्तुत ग्रंथ का वर्ण्य विषय "अगम्" या अंतरंग जीवन से संबंधित है। |